मुर्गियों के बाद बत्तखें भारत में दूसरे नंबर की पोल्ट्री हैं, जिन्हें ज़्यादातर अंडों के लिए और मांस के लिए भी पाला जाता है (ICAR-DPR)। केरल के कुट्टनाड, तमिलनाडु के धान वाले जिलों और आंध्र प्रदेश के कृष्णा–गोदावरी डेल्टा में बत्तखों के झुंड कटाई के बाद धान के खेतों में चरते हैं। इस पेज पर पढ़ें: पालन, नस्लें, खरीदना, सेहत, और बर्ड फ्लू के वे नियम जो हर बत्तख पालक को पता होने चाहिए।
बत्तखें किस लिए पाली जाती हैं
- अंडे। सबसे मुख्य उपज। तमिलनाडु की स्थानीय बत्तखें साल में करीब 160–200 अंडे देती हैं, औसतन करीब 62 ग्राम के, ज़्यादातर आधी रात से सुबह 6 बजे के बीच (TANUVAS अध्ययन)। बत्तखें दूसरे साल में भी अच्छे अंडे देती रहती हैं (TNAU)।
- मांस। चराए जाने वाले झुंड 2–3 साल रखे जाते हैं और फिर मांस के लिए बेच दिए जाते हैं (TANUVAS अध्ययन)। सफ़ेद पेकिन और मस्कोवी मांस वाली बत्तखों के रूप में पाली जाती हैं।
- बत्तख के चूजे। कई पालक बत्तख के चूजे निकालकर बेचते हैं। तमिलनाडु में आज भी बत्तख के अंडे ज़्यादातर अंडे सेने बैठी मुर्गियों के नीचे सेए जाते हैं — एक मुर्गी के नीचे 15–20 अंडे, 28 दिन तक (TANUVAS अध्ययन)।
- धान के खेत में मदद। कटे हुए खेतों में बत्तखें गिरा हुआ अनाज, घोंघे, और टिड्डे और भृंग जैसे कीड़े खाती हैं, और उनकी बीट मिट्टी को खाद देती है (ICAR-DPR समीक्षा)।
भारत की लगभग सारी बत्तखें, करीब 97%, फ़ार्मों पर नहीं, बल्कि घर-आँगन और गाँव के झुंडों में पाली जाती हैं। भारत के बत्तख के अंडों का करीब 10% केरल में और करीब 6% आंध्र प्रदेश में होता है (ICAR-DPR समीक्षा)।
बत्तखें कहाँ पाली जाती हैं
- तमिलनाडु। जहाँ धान और पानी है, वहाँ झुंड जमा होते हैं। TANUVAS के एक सर्वे में ज़्यादा बत्तखों वाले आठ जिलों का अध्ययन किया गया: उत्तर में तिरुवल्लूर और कांचीपुरम, पश्चिम में करूर और इरोड, पूर्व में तिरुचिरापल्ली और तंजावुर, और दक्षिण में तिरुनेलवेली और कन्याकुमारी। 2009 के एक अनुमान के अनुसार राज्य की 70% बत्तखें कांचीपुरम, तिरुवल्लूर, विलुप्पुरम, कडलूर, वेल्लोर और तिरुवन्नामलै में थीं, उस समय की जिला सीमाओं के हिसाब से (TANUVAS सर्वे)।
- केरल। अलप्पुझा, कोट्टयम और पथनमथिट्टा जिलों में फैला कुट्टनाड, कुट्टनाड बत्तख का घर है (ICAR)। वहाँ कटाई के बाद झुंडों को धान के खेतों में छोड़ा जाता है, और कई पालक अपनी बत्तखों के साथ जगह-जगह घूमते हैं (केरल जैव विविधता बोर्ड)।
- आंध्र प्रदेश। NBAGR के एक सर्वे में कृष्णा और पश्चिम गोदावरी जिलों में धान के साथ-साथ पाली जाने वाली बत्तखें मिलीं, जो दिखने में काफ़ी हद तक केरल की बत्तखों जैसी हैं (NBAGR अध्ययन)। वहाँ के झुंड एक खेत से दूसरे खेत जाते हैं, करीब 180 दिन की उम्र में अंडे देना शुरू करते हैं और साल में 120–150 अंडे देते हैं (ICAR-DPR)।
दक्षिण भारत में बत्तखें कैसे पाली जाती हैं
ICAR-DPR तीन तरीके बताता है (ICAR-DPR समीक्षा):
- खुला तरीका: सिर्फ़ रात का आसरा; बत्तखें अपना सारा भोजन बाहर खुद ढूँढती हैं।
- अर्ध-सघन: रात में घर, थोड़ा घर का बना दाना, और दिन में बाहर चुगना। ज़्यादातर किसान बत्तखें इसी तरह पालते हैं।
- सघन: धान की भूसी या कटे पुआल की मोटी बिछावन (डीप लिटर) वाला बंद घर, जिसके अंदर ही दाना और पानी हो, पानी की नालियों के साथ या उनके बिना।
TANUVAS के सर्वे में तमिलनाडु के ज़्यादातर बत्तख पालक भूमिहीन थे और अपने झुंड लेकर एक जगह से दूसरी जगह जाते थे (TANUVAS सर्वे)। TANUVAS का एक पुराना अध्ययन बताता है कि ये चराए जाने वाले झुंड कैसे पाले जाते हैं (TANUVAS अध्ययन):
- झुंड का आकार। झुंड दर्जनों में गिने जाते हैं: आम तौर पर 12 दर्जन बत्तखें, 5 से 25 दर्जन तक, और हर 12 बत्तखों पर एक नर बत्तख।
- चराई। दिन में बत्तखें कटे हुए धान के खेतों, तालाबों, झीलों और नहरों में गिरा अनाज, घोंघे और छोटी मछलियाँ चुगती हैं। 1,000 बत्तखों के लिए रोज़ करीब 4–5 एकड़ कटा धान चाहिए; पालक खेत पहले से बुक करते हैं और ज़मीन के मालिक को पैसे देते हैं।
- रात का बाड़ा। ऊँचे चबूतरे पर बाँस या प्लास्टिक की जाली का बाड़ा, जिसे उठाकर कहीं भी ले जाया जा सकता है।
- घूमना। झुंड एक बार में 3–4 महीने सफ़र करते हैं: उत्तरी जिलों से पुडुचेरी, मध्य तमिलनाडु से तंजावुर डेल्टा, और दक्षिण से कन्याकुमारी तक, और कभी-कभी केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश तक भी।
- बत्तख के चूजे। उन्हें पहले चावल का आटा और फिर टूटा चावल दिया जाता है; तीसरे दिन से वे पानी में जाते हैं, और करीब 35 दिन की उम्र में झुंड के साथ चरने लगते हैं।
बत्तख की नस्लें
दक्षिणी राज्यों की सिर्फ़ एक बत्तख नस्ल भारत के नस्ल रजिस्टर में है: केरल की कुट्टनाड बत्तख (ICAR-NBAGR)। विदेश की तीन नस्लें भी खूब पाली जाती हैं:

बत्तख
कुट्टनाड
कुट्टनाड के बैकवॉटर इलाके की केरल की पंजीकृत बत्तख, जिसके दो रंग-प्रकार हैं, ‘चारा’ और ‘चेमबाली’; इसे अंडों और मांस के लिए पाला जाता है।

बत्तख
मस्कोवी (मनीला)
“मनीला” बत्तख: दक्षिण अमेरिका की एक अलग प्रजाति, जिसे कम चर्बी वाले मांस के लिए पाला जाता है।
नर बत्तख 4.5–6.4 किलो · मादा बत्तख 2.2–3.1 किलो

बत्तख
खाकी कैम्पबेल
ब्रिटेन (यूनाइटेड किंगडम) की अंडे वाली नस्ल, जिसे सरकारी बत्तख फ़ार्म लेकर आए।
नर बत्तख 2.2–2.4 किलो · मादा बत्तख 2–2.2 किलो

बत्तख
सफ़ेद पेकिन
तेज़ी से बढ़ने वाली सफ़ेद, मांस वाली बत्तख, जो चीन से आई।
नर बत्तख 4 किलो · मादा बत्तख 3.5 किलो
इंडियन रनर
इंडियन रनर अंडे वाली बत्तख है, जो पेंगुइन की तरह सीधी खड़ी होती है और डगमगाकर चलने के बजाय तेज़ी से भागती है। नाम के बावजूद ICAR-DPR इसका मूल इंडोनेशिया और मलेशिया बताता है। यह बादामी-सफ़ेद, सफ़ेद और पेंसिल्ड (बारीक धारियों वाली) किस्मों में आती है। नर का वज़न करीब 1.6–2.2 किलो और मादा का 1.4–2 किलो होता है, और पुस्तिकाओं के अनुसार यह साल में करीब 200–300 सफ़ेद अंडे देती है (ICAR-DPR समीक्षा)।
तमिलनाडु की स्थानीय बत्तखें
तमिलनाडु की ज़्यादातर बत्तखें कई रंगों और आकारों की स्थानीय बत्तखें हैं, और इनमें से कोई भी पंजीकृत नस्ल नहीं है (TANUVAS अध्ययन, ICAR-NBAGR)।
- कोल्लम और आरणी बत्तखें। दक्षिणी जिलों के किसान पुरानी बत्तखों की जगह नई बत्तखें केरल के कोल्लम इलाके से खरीदते हैं, और उत्तरी जिलों के किसान आरणी इलाके से, इसलिए बत्तखें इन्हीं नामों से जानी जाती हैं (TANUVAS अध्ययन)।
- सन्यासी और कीरी। दो स्थानीय प्रकार, जिनके नाम उनके पंखों के खास रंगों और नमूनों से पड़े हैं (ICAR-DPR)।
- किसान इन्हें क्यों पालते हैं। ये मज़बूत होती हैं, इन्हें ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए, और ये बड़े अंडे देती हैं: साल में करीब 160–200, हालाँकि अंडे देना नियमित नहीं होता; अंडे करीब 60–64 ग्राम के होते हैं (ICAR-DPR समीक्षा)। चराए जाने वाले झुंडों के लिए किसानों ने इन्हें खाकी कैम्पबेल से ज़्यादा पसंद किया है (TANUVAS अध्ययन)।
बत्तखें खरीदना
पैसे देने से पहले पक्षियों को दिन के उजाले में खुद देखें।
- स्वस्थ या बीमार? चुस्त, फुर्तीली बत्तखें चुनें। ऐसी बत्तख न लें जो कमज़ोर या सुस्त हो, अलग बैठी रहे, या जिसके पंख लटके हों, आँखों या सिर के आस-पास सूजन हो, नाक बहती हो या दस्त हों; ये बर्ड फ्लू या बत्तख हैजा के लक्षण हो सकते हैं (DAHD कार्य योजना, TNAU)।
- नर या मादा? नर बड़े होते हैं, उनके पंख और चोंच ज़्यादा चमकीले होते हैं, पूँछ के पास एक मुड़ा हुआ पंख होता है, और उनकी आवाज़ धीमी और भर्राई हुई होती है; मादाओं के रंग फीके होते हैं और आवाज़ तेज़ (ICAR-DPR समीक्षा)। मस्कोवी में यह अलग होता है: देखें मस्कोवी का पेज।
- उम्र। तमिलनाडु की स्थानीय बत्तखें करीब 24 हफ़्ते की उम्र में अंडे देना शुरू करती हैं, और झुंड 2–3 साल रखे जाते हैं (TANUVAS अध्ययन)। अंडे से निकलने की तारीख पूछें, और बूढ़ी बत्तखें जवान अंडे देने वाली समझकर न खरीदें।
- टीकों का रिकॉर्ड। पूछें कि पक्षियों को कौन-से टीके कब लगे, और यह अपनी रसीद पर लिख लें।
- बर्ड फ्लू। जिस इलाके में बर्ड फ्लू की सूचना जारी हो, वहाँ से न खरीदें। बीमारी फैलने की जगह के आस-पास के क्षेत्र से पोल्ट्री बाहर नहीं जा सकती, और नए पक्षी सिर्फ़ उन्हीं इलाकों से आने चाहिए जो बर्ड फ्लू से मुक्त माने गए हैं (DAHD कार्य योजना)। मौजूदा सूचनाओं के बारे में अपने नज़दीकी पशु चिकित्सालय से पूछें।
- नई बत्तखों को अलग रखें: कम से कम 30 दिन तक अपने झुंड से दूर (DAHD कार्य योजना)।
- पक्षियों को ले जाना। पोल्ट्री के परिवहन नियम बत्तखों पर भी लागू होते हैं (AWBI): जब तापमान 25°C से ज़्यादा या 15°C से कम हो, तब पक्षियों को न ले जाएं, इसलिए सुबह-सुबह या रात की ठंडक में सफ़र करें; डिब्बों को पहले साफ़ करके कीटाणुरहित करें; बड़े पक्षियों के लिए पशु चिकित्सक का प्रमाणपत्र चाहिए कि उन्हें कोई छूत की बीमारी नहीं है और वे यात्रा के लायक हैं; हर डिब्बे में एक ही प्रजाति और एक ही उम्र के पक्षी रखें, नर और मादा अलग; डिब्बों को कभी एक के ऊपर एक न रखें; उन पर भेजने वाले और लेने वाले का ब्योरा लिखें; और गर्म मौसम में हर 6 घंटे में पानी दें।
- सुरक्षित तरीके से पैसे दें। जो पक्षी आपने देखे नहीं हैं, उनके लिए कभी एडवांस न दें: देखें सुरक्षित तरीके से पैसे कैसे दें।
बत्तखों को स्वस्थ रखें
- टीकाकरण। डक प्लेग और बत्तख हैजा के टीकों के बारे में अपने पशु चिकित्सक से पूछें। तमिलनाडु की चराई वाली बत्तखों की सबसे ज़्यादा मौतें डक प्लेग से होती थीं: 1980 के दशक से पहले यह किसी झुंड की 90–100% बत्तखों को मार सकता था, और टीकाकरण ने यह बदल दिया (TANUVAS अध्ययन)। बत्तखों को एक बार डक प्लेग हो जाए तो उसका कोई इलाज नहीं है, इसलिए समय पर टीके लगवाएं (TNAU)। केरल में राज्य का पालोड संस्थान दोनों टीके बनाता है और सरकारी पशु चिकित्सा संस्थानों के ज़रिए मुफ़्त देता है (केरल AHD)।
- साफ़, सूखा दाना। फफूंद लगा दाना कभी न दें: बत्तखों पर एफ़्लाटॉक्सिन का बहुत बुरा असर होता है, जो सीलन वाली मक्का, मूँगफली और चावल की पॉलिश में लगने वाली फफूंद का ज़हर है। बत्तखों को सड़ते पौधों से दूर रखें, जिनसे बोटुलिज़्म हो सकता है, और रुके हुए, भीड़ वाले तालाबों से भी, जहाँ पेट के कीड़े फैलते हैं (TNAU)।
- जैव सुरक्षा। अपनी बत्तखों को जंगली पक्षियों और पड़ोसियों के पक्षियों से दूर रखें। आँगन साफ़ रखें और कचरे को गाड़ दें या जला दें। पक्षियों के पास सिर्फ़ उनकी देखभाल करने वाले लोग ही जाएं, और वे पहले और बाद में हाथ, जूते और कपड़े धोएं। उधार लिए उपकरणों को साफ़ करके कीटाणुरहित करें (DAHD कार्य योजना)।
- बत्तखें और बर्ड फ्लू। संक्रमित पानी से गुज़रने वाली बत्तखें बीमार दिखे बिना भी बर्ड फ्लू का बहुत सारा वायरस फैला सकती हैं (DAHD कार्य योजना)। इन पर नज़र रखें: अचानक मौतें, अंडों में कमी, कमज़ोरी, लटके पंख, अपनी जगह से न हिलने वाले पक्षी, आँखों या सिर के आस-पास सूजन, और बहती नाक।
- 24 घंटे के अंदर सूचना दें। राष्ट्रीय बर्ड फ्लू कार्य योजना कहती है कि पालतू या जंगली पक्षियों में असामान्य बीमारी या मौतें देखने वाला हर व्यक्ति तुरंत, और 24 घंटे के अंदर, इसकी सूचना नज़दीकी पशु चिकित्सा संस्थान या किसी दूसरे सरकारी दफ़्तर को दे (DAHD कार्य योजना)। मोबाइल पशु चिकित्सा इकाई के लिए आप टोल-फ़्री नंबर 1962 भी डायल कर सकते हैं (PIB)। मरे हुए पक्षियों को ठीक से गाड़ें; उन्हें कभी नालियों में या खुली ज़मीन पर न फेंकें (DAHD कार्य योजना)।
- अगर बर्ड फ्लू की पुष्टि हो जाए। 1 किमी के अंदर की सारी पोल्ट्री, घर-आँगन के पक्षियों समेत, मार दी जाती है (कलिंग), और 10 किमी तक के इलाके पर निगरानी रखी जाती है। पोल्ट्री को कहीं ले नहीं जाया जा सकता, और 10 किमी के अंदर की पोल्ट्री और अंडों की दुकानें तब तक बंद रहती हैं जब तक कलिंग और सफ़ाई पूरी न हो जाए। इलाके को सफ़ाई का प्रमाणपत्र मिलने के 90 दिन बाद दोबारा पक्षी रखने की अनुमति मिलती है। मालिकों को तय दरों पर मुआवज़ा मिलता है, जिसका खर्च केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर उठाती हैं, लेकिन कलिंग के समय छिपाए गए और बाद में मिले पक्षी बिना मुआवज़े के मार दिए जाते हैं (DAHD कार्य योजना, PIB)। केरल के कुट्टनाड में कई बार यह बीमारी फैली है और कलिंग हुई है (Down To Earth)। ताज़ा हालात के लिए अपने जिले की सूचनाएं देखें।
बत्तख पालकों के लिए नियम
- अपना फ़ार्म पंजीकृत कराएं। केंद्र के पशुपालन विभाग ने निर्देश दिया है कि सभी पोल्ट्री फ़ार्म अपने राज्य के पशुपालन विभाग में पंजीकरण कराएं (PIB)। अपने नज़दीकी पशु चिकित्सालय से पूछें कि यह आपके बत्तख फ़ार्म या झुंड पर कैसे लागू होता है।
- प्रदूषण बोर्ड। पोल्ट्री फ़ार्मों को राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सहमति चाहिए, और फ़ार्म के जिस आकार से यह नियम लागू होता है, वह सालों में बदलता रहा है। बड़ा शेड बनाने से पहले बोर्ड के जिला कार्यालय से पूछें (CPCB)।
- जंगली बत्तखें संरक्षित हैं। भारत की जंगली बत्तखें, जैसे व्हिसलिंग डक, स्पॉट-बिल्ड डक, टील और कॉटन पिग्मी गूज़, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम में दर्ज हैं, इसलिए इन्हें पकड़ना, रखना या बेचना अपराध है (वन्यजीव अधिनियम)। जंगली पक्षियों को कभी न पकड़ें, न अपने झुंड के साथ रखें (DAHD कार्य योजना)।
- लोन। बैंक लोन, किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) और राष्ट्रीय पशुधन मिशन (NLM) के लिए देखें: देसी मुर्गी पालन: 2026 में सब्सिडी, लोन और बीमा। यह गाइड मुर्गियों के लिए लिखी गई है, इसलिए अपने बैंक या पशु चिकित्सालय से पूछें कि बत्तखों पर क्या लागू होता है।
नियम बदलते रहते हैं — अपने नज़दीकी पशु चिकित्सालय या पशुपालन विभाग के कार्यालय से पुष्टि कर लें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या बत्तखों के लिए तालाब ज़रूरी है?
नहीं। बत्तखें पानी की नालियों के साथ या उनके बिना भी बंद घर में पाली जा सकती हैं (ICAR-DPR समीक्षा), और मस्कोवी बत्तखों को दूसरी बत्तखों से कम पानी चाहिए। चराए जाने वाले झुंड खेतों, तालाबों और नहरों का इस्तेमाल करते हैं।
एक बत्तख साल में कितने अंडे देती है?
तमिलनाडु की स्थानीय बत्तखें करीब 160–200 (TANUVAS अध्ययन), और भारत में किसानों के यहाँ हुए अध्ययनों में खाकी कैम्पबेल करीब 120–193। घर-आँगन की बत्तखें फ़ार्म की बत्तखों से कम अंडे देती हैं: भारत में उन्नत बत्तखों ने घर-आँगन में साल में औसतन करीब 179 और फ़ार्मों पर करीब 202 अंडे दिए (ICAR-DPR समीक्षा)।
अगर बत्तखें अचानक मरने लगें तो क्या करें?
24 घंटे के अंदर अपने नज़दीकी पशु चिकित्सालय को बताएं, या 1962 डायल करें (DAHD कार्य योजना)। जब तक पशु चिकित्सक पक्षियों को देख न लें, तब तक कोई पक्षी न बेचें, न कहीं ले जाएं।
क्या जंगली बत्तखें पकड़कर पाली जा सकती हैं?
नहीं। जंगली बत्तखें वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत संरक्षित हैं, और जंगली पक्षी आपके झुंड में बर्ड फ्लू ला सकते हैं (वन्यजीव अधिनियम, DAHD कार्य योजना)।
आगे पढ़ें
बत्तख की नस्लों कुट्टनाड, मस्कोवी (मनीला), खाकी कैम्पबेल और सफ़ेद पेकिन के बारे में पढ़ें, या दूसरे पक्षियों के बारे में: देसी मुर्गी पालन: दक्षिण भारत में नस्लें, खरीद और देखभाल, बटेर पालन: जापानी बटेर, अंडे और कानून और टर्की पालन: किस्में, पालने का तरीका, खरीद और सेहत। आपके पास के किसान क्या बेच रहे हैं, यह देखने के लिए बिकाऊ बत्तखें देखें।
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अपने गाँव के पास के किसानों की बिकाऊ बत्तखें और उनके चूजे सीधे देखें — फ़ोटो, गाँव के नाम और दूरी के साथ। कोई दलाल नहीं। किसान को कॉल या चैट करें, फिर पैसे देने से पहले पक्षियों को खुद देखकर जाँचें।
कोई खास नस्ल चाहिए? कट्टुतरै ऐप में उसका नाम खोजें, जैसे खाकी कैम्पबेल, सफेद पेकिन या मनीला (मस्कोवी)।

