दक्कनी, दक्कन के पठार की एक मज़बूत काली भेड़ है, जिसे मुख्य रूप से मांस के लिए पाला जाता है और जिसकी खुरदरी ऊन भी कतरी जाती है। इसका मूल इलाका ज़्यादातर दक्षिण-पूर्वी महाराष्ट्र में है और पड़ोसी कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों तक फैला है (ICAR-NBAGR); नस्ल रजिस्टर में यह आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र की नस्ल के रूप में दर्ज है (ICAR-NBAGR)।
इसे कैसे पहचानें
- रंग: ज़्यादातर काला, या काले पर सफ़ेद निशान; सफ़ेद, भूरी और हल्की बादामी भेड़ें भी मिलती हैं (ICAR-NBAGR)।
- ऊन: बहुत खुरदरी, बालों जैसी और खुली (घनी नहीं)। सिर और चेहरे पर ऊन नहीं होती, और पेट ऊन से ढका रहता है (ICAR-NBAGR)।
- सिर: पतला चेहरा और उभरी हुई (रोमन) नाक, मध्यम आकार के चपटे, लटकते कान (करीब 16–17 सेमी), और गले में लटकन नहीं (ICAR-NBAGR)।
- सींग: मेढ़ों के सींग होते हैं, भेड़ों के नहीं (FAO)।
- वज़न: मेढ़े का वज़न करीब 38 किलो और भेड़ का करीब 31 किलो होता है; जन्म के समय मेमने का वज़न करीब 2.75 किलो होता है (ICAR-NBAGR)।
यह किस काम आती है
- पहले मांस, फिर ऊन। NBAGR ने इसके उपयोग मांस और ऊन बताए हैं, और इसे मांस की नस्ल कहा है (ICAR-NBAGR); NBAGR के एक अध्ययन में इसे खुरदरी ऊन वाली, मध्यम आकार की भेड़ बताया गया है, जिसे मुख्य रूप से मांस के लिए पाला जाता है (NBAGR अध्ययन)।
- खुरदरी ऊन: हर भेड़ से साल में करीब 0.74 किलो ऊन (ICAR-NBAGR)।
- मेमने: आम तौर पर एक; औसतन हर ब्यांत में करीब 1.04। भेड़ों का पहला मेमना करीब 16 महीने की उम्र में होता है, और दो ब्यांतों के बीच करीब 9.5 महीने का अंतर रहता है (ICAR-NBAGR)।
- मज़बूत: यह लंबे प्रवास, कमज़ोर चारा, सूखा और गर्म इलाकों की बीमारियाँ झेल लेती है (NBAGR अध्ययन)।
यह मुख्य रूप से कहाँ मिलती है
NBAGR के नस्ल रिकॉर्ड के अनुसार दक्कनी मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्वी महाराष्ट्र (पुणे, सातारा, सोलापुर, सांगली, कोल्हापुर, अहमदनगर, बीड और नासिक) में, और पड़ोसी आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के इलाकों में मिलती है; कर्नाटक में यह रिकॉर्ड बेलगावी (बेलगाम) का नाम लेता है। वहाँ की मिट्टी हल्की मिट्टी से लेकर गहरी काली (कपास वाली) मिट्टी तक है (ICAR-NBAGR)।
तेलंगाना में, राज्य के कृषि विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में महबूबनगर जिले को इस नस्ल के मूल इलाके का हिस्सा बताया गया है (विश्वविद्यालय का अध्ययन)। महबूबनगर में PVNRTVU का पशुधन अनुसंधान केंद्र दक्कनी भेड़ों के सुधार और संरक्षण का काम करता है, और उसने 2010 से 2024 के बीच किसानों को 350 से ज़्यादा दक्कनी मेढ़े दिए (PVNRTVU)।
पुराने विवरणों में दक्कनी झुंड इससे बड़े इलाके में बताए गए हैं, जिसमें कर्नाटक के बीदर, विजयपुरा, कलबुर्गी और रायचूर, और आज के तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के कई जिले शामिल हैं (FAO)। महाराष्ट्र में वैज्ञानिकों ने दक्कनी की पाँच स्थानीय किस्में बताई हैं: कोल्हापुरी, लोणंद, माडग्याल, सोलापुरी और संगमनेरी (NBAGR अध्ययन)। माडग्याल अब अपने आप में एक अलग पंजीकृत नस्ल है (ICAR-NBAGR)।
दक्कनी भेड़ चाहिए?
अपने पास बिकाऊ दक्कनी भेड़ें ढूँढने के लिए कट्टुतरै ऐप में “दक्कनी” खोजें (कट्टुतरै पर भेड़ें ‘बकरी’ श्रेणी में हैं)। नस्ल विक्रेता बताता है और कट्टुतरै उसकी जाँच नहीं करता, इसलिए पैसे देने से पहले पशु को खुद देखें।
पालने के सुझाव
- साल भर चराई। बरसात में झुंड घास के मैदानों में चरते हैं; बाकी साल परती और कटाई हो चुके खेतों में। कम ही किसान चारा उगाते हैं, और भेड़ों को सिर्फ़ रात में बाड़े में रखा जाता है (ICAR-NBAGR)। सूखे महीनों में थोड़ा चारा उगाना काम आता है: अपना चारा खुद उगाएं।
- प्रवास। कई झुंड चराई की तलाश में मौसम के साथ एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं (ICAR-NBAGR)। एक ही जगह टिके फ़ार्म को साल भर काफ़ी चराई या काटकर खिलाने लायक चारा चाहिए; देखें बकरी का चारा-दाना: हरा-सूखा चारा, दाना मिश्रण और पानी।
- रात का बाड़ा: इसे सूखा और अच्छी तरह घेरकर रखें; देखें बकरी का बाड़ा (शेड): हर बकरी की जगह, फ़र्श और छत।
- मेढ़े: जाने-माने झुंडों से मेढ़े खरीदें और उन्हें समय पर बदलें: नज़दीकी रिश्ते में प्रजनन से बचें। PVNRTVU का महबूबनगर केंद्र किसानों को दक्कनी मेढ़े देता है (PVNRTVU)।
- सेहत: भेड़ों को भी बकरियों जैसी ही रोज़ की जाँच, टीकाकरण और कृमिनाशन (पेट के कीड़ों की दवा देना) चाहिए। बकरी की सेहत: टीकाकरण कैलेंडर और कृमिनाशन में बताई गई बातें अपनाएं, और अपने पशु चिकित्सक से पूछें कि आपके इलाके में भेड़ों को कौन-से टीके चाहिए।
खरीदने के सुझाव
- नस्ल की पहचान जाँचें: काली या काली-सफ़ेद भेड़, खुरदरी और खुली ऊन, बिना ऊन का चेहरा, उभरी हुई (रोमन) नाक, चपटे लटकते कान, और गले में लटकन नहीं (ICAR-NBAGR)। चिकने, छोटे बालों वाला शरीर और गले में लटकन इस नस्ल से मेल नहीं खाते।
- संकर आम हैं। सातारा जिले में लोणंद किस्म के NBAGR सर्वेक्षण में किसान बाहर से माडग्याल मेढ़े ला रहे थे, और सिर्फ़ करीब 15% भेड़ें शुद्ध थीं (NBAGR अध्ययन)। झुंड और उसमें इस्तेमाल होने वाला मेढ़ा दिखाने को कहें।
- विज्ञापन में नस्ल का नाम विक्रेता का बताया हुआ होता है। कट्टुतरै उसकी जाँच नहीं करता, इसलिए पैसे देने से पहले भेड़ को खुद देखें।
- उम्र और सेहत: बकरियों की तरह आगे के बड़े दाँत गिनें (दाँतों की तालिका), पर उससे निकली उम्र को मोटा अंदाज़ा ही मानें, और बकरी सुरक्षित कैसे खरीदें: सेहत, उम्र और ठगी से बचाव में बताई गई बातें अपनाएं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या दक्कनी और बेल्लारी भेड़ एक ही हैं?
नहीं, हालाँकि दोनों काफ़ी मिलती-जुलती हैं। FAO के एक सर्वेक्षण में लिखा है कि दोनों में ज़्यादा फ़र्क नहीं है: तुंगभद्रा नदी के उत्तर की भेड़ों को दक्कनी और दक्षिण की भेड़ों को बेल्लारी कहा जाता है (FAO)। NBAGR ने दोनों को अलग-अलग नस्लों के रूप में पंजीकृत किया है (ICAR-NBAGR)।
दक्कनी भेड़ से कितनी ऊन मिलती है?
साल में करीब 0.74 किलो खुरदरी ऊन (ICAR-NBAGR)।
दक्कनी भेड़ का वज़न कितना होता है?
मेढ़े का वज़न करीब 38 किलो और भेड़ का करीब 31 किलो होता है।
क्या दक्कनी नए भेड़ पालक के लिए ठीक है?
यह मज़बूत है और चराई पर पल जाती है, इसलिए चराई की ज़मीन वाले सूखे इलाकों के लिए ठीक है। जाने-माने झुंड से ही खरीदें, क्योंकि संकर आम हैं।
आगे पढ़ें
इसकी तुलना नेल्लोर भेड़ और बंडूर (मांड्या) भेड़ से करें, या इसी दक्कन के पठार की उस्मानाबादी बकरी से। यह भी पढ़ें: बकरी का चारा-दाना: हरा-सूखा चारा, दाना मिश्रण और पानी। सभी नस्लों की गाइड देखें, और बिकाऊ बकरियाँ और भेड़ें देखें।
